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गीता दर्शन–(प्रवचन–179)

सुख नहीं, शांति खोजो—(प्रवचन—तीसरा) अध्‍याय—17     सूत्र: अशास्‍त्रविहितं धीरं तप्यन्ते ये तपो जना:। दम्भाहंकारसंयुक्‍ता: कामरागबलान्त्तिता:।। 5।। कर्शयन्त: शरीरस्थं भूतग्राममचेतस:। मां चैवान्त:शरीरस्थं तान्‍विद्धय्यासुरीनश्चयान्।। 6।। और है अर्जुन, जो मनुष्य शास्त्र— विधि...

गीता दर्शन–(प्रवचन–178)

भक्‍ति और भगवान—(प्रवचन—दूसरा) अध्‍याय—17    सूत्र सत्‍वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो वो यव्छुद्ध: स एव सः।। 3।। यजन्ते सात्‍विका देवान्यक्षरक्षांति राजसाः। प्रेतान्धूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना: ।। 4।।   है भारत...

गीता दर्शन–(प्रवचन–177)

सत्‍य की खोज और त्रिगुण का गणित—(प्रवचन—पहला) अध्‍याय—17   सूत्र— (श्रीमद्भगवद्गीता अथ सप्तदशोऽध्याय) अर्जन उवाच: ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धायान्विता। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण तत्त्वमाहो रजस्तम:।। 1।। श्रॉभगवानवाच: त्रिविधा भवति...

गीता दर्शन—(भाग—आठ) ओशो

(ओशो द्वारा श्रीमदभगवद्गीता के अध्‍याय सत्रह ‘श्रद्धात्रय—विभाग—योग’ एवं अध्‍याय अठारह ‘मोक्ष—संन्‍यास—योग’ पर दिए गये बत्‍तीस अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।) भूमिका: (ओशो कृष्‍ण चेतना) गीता एक महावाक्य,...

गीता दर्शन–(प्रवचन–176)

नरक के द्वार: काम, क्रोध, लोभ—(प्रवचन—आठवां) अध्‍याय—16    सूत्र— त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:। काम: क्रोधस्तथा लौभस्तस्मादैतन्त्रयं त्यजेत्।। 21।। एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमद्धोरैस्प्रिभिर्नर:। आचरत्यक्ष्मन: श्रेयस्‍स्‍ततो यति परां गतिम्।। 22।। यः शास्त्रविश्वैमुत्सृज्य वर्तते...

गीता दर्शन–(प्रवचन–175)

जीवन की दिशा—(प्रवचन—सातवां) अध्‍याय—16     सूत्र: अत्मसंभाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता:। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।। 17।। अहंकारं बलं दर्प कामं क्रोध च संश्रता:। मामत्‍मपरहेहेषु प्रद्धईषन्तोऽभ्यसूक्का:।। 18।। तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षियाम्यजस्रमशुभानासुरीष्येव योनिषु।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–174)

ऊर्ध्‍वगमन और अधोगमन—(प्रवचन—छठवां) अध्‍याय—16     सूत्र— इदमद्य मया लब्‍धमिमं प्राप्‍स्‍ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। 13।। असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्‍ये चापरानपि। ईश्वरोऽहम्हं भोगी सिद्धोsहं बलवान्तुखी।। 14।। आढ्योऽभिजनवानस्मि कीऽन्योऽस्ति...

गीता दर्शन–(प्रवचन–173)

शोषण या साधना—(प्रवचन—पांचवां) अध्‍याय—16    सूत्र— काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता:। मोहाङ्गाहींत्त्वीसद्ग्राहागर्क्तन्‍तेउशुचिव्रता:।। 10।। चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुयश्रिता:। कामोयभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:।। 11।। आशापाशशातैर्बद्धा: कामक्रोधयरायणा। ईहन्‍ते कामभोगार्थमन्यायेनार्श्रसंचयान्।। 12।।   और वे मनुष्य दंभ, मान और मद से...

गीता दर्शन–(प्रवचन–172)

आसुरी व्‍यक्‍ति की रूग्‍णताएं—(प्रवचन—चौथा) अध्‍याय—16     सूत्र— प्रवृत्तिं च निवृत्ति च जना न विदरासरा:। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।। 7।। असत्यमप्रितष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। अपरस्थरसंभूतं किमन्यत्काकैक्कुम्।। 8।। एंता...

गीता दर्शन–(प्रवचन–171)

आसुरी संपदा—(प्रवचन—तीसरा) अध्‍याय—16     सूत्र: दम्भो दयोंऽभिमानश्च क्रोध: पारूष्‍यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्म पार्थ संपदमासुशँम्।। 4।। दैवी संयद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः संपदं दैवीमीभजातोऽसि पाण्डव।। 5।। द्वौ भूतसगौं लस्कैऽस्मिन्दैव आसुर एव च। दैवो...

गीता दर्शन–(प्रवचन–170)

दैवीय लक्षण—(प्रवचन—दूसरा) अध्‍याय—16    सूत्र— अहिंसा सत्‍यमक्रोधस्‍त्‍याग: शान्‍तिरपैशुनम्। दया भूतेष्‍वलोलुप्‍त्‍वं मार्दवं ह्ररिचापलम्।। 2।। तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता। भवन्ति संपदं दैवीमीभिजातस्य भारत।। 3।।   दैवी संयदायुक्‍त पुरुष के अन्य लक्षण हैं :...

गीता दर्शन–(प्रवचन–169)

दैवी संपदा का अर्जन—(प्रवचन—पहला) अध्‍याय—16     सूत्र— (श्रीमद्भगवद्गीता)  श्रीभगवानवाच: अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति:। दानं दमश्च यज्ञश्‍च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।। 1।। उसके उपरांत श्रीकृष्‍ण भगवान फिर बोले कि हे अर्जुन, दैवी संपदा जिन पुरूषों को...

गीता दर्शन–(प्रवचन–168)

प्‍यास और धैर्य—(प्रवचन—सातवां) अध्‍याय—15   सूत्र— यो मामैवमसंमूढो जानति पुरुषोत्तमम्। स सर्वोविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।। 19।। इति गुह्यतमं शास्त्रीमदमुक्‍तं मयानघ। एतदबद्ध्वा बुद्धिमान्‍स्‍यत्‍कृतकृत्‍यश्‍च भारत।। 20।।   है भारत, हस प्रकार तत्व से...

गीता दर्शन–(प्रवचन–167)

पुरूषोत्‍तम की खोज—(प्रवचन—छठवां) अध्‍याय—15    सूत्र द्वाविमौ पुरूषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्‍यते।। 16।। उत्तम: पुरूषस्‍त्‍वन्य: परमात्मेत्युदाह्वत:। यो लस्केत्रयमाविश्य बिभर्त्सव्यय ईश्वर:।। 17।। यस्मात्‍क्षरमर्तोतोऽहमक्षरादीप चोत्तम:। अतोऽस्मि लोके वेदे च...

गीता दर्शन–(प्रवचन–166)

एकाग्रता और ह्रदय—शुद्धि—(प्रवचन—पांचवां) अध्‍याय—15 सूत्र— यदादित्यगतं तेजो जगद्यासयतेऽखिलम्। यच्‍चन्द्रमलि यचाग्नौ तत्तेजो विद्धि माक्कम्।। 12।। गामाविश्य च भूतानि धारयाथ्यमोजसा। पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:।। 13।। अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां...

गीता दर्शन–(प्रवचन–165)

समर्पण की छलांग—(प्रवचन—चौथा) अध्‍याय—15  सूत्र— उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुज्‍जानं वा गुणान्यितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचमुष:।। 10।। यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यज्यात्मन्यवस्थितम्। यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यक्यधेतस:।। 11।।   परंतु शरीर छोड़कर जाते हुए को...

गीता दर्शन–(प्रवचन–164)

संकल्‍प—संसार का या मोक्ष का—(प्रवचन—तीसरा) अध्‍याय—15 --सूत्र न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पाक्क:। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। 6।। ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–163)

दृढ़ वैराग्‍य और शरणागति—(प्रवचन—दूसरा) अध्‍याय—15 --सूत्र न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा। अश्वथमेनं सुविरूद्धमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढ़ेन छित्‍वा।। 3।। तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं यीस्मन्गता न निवतर्न्ति भूय:। तमेव ब्राह्य...

गीता दर्शन–(प्रवचन–162)

मूल—स्‍त्रोत की और वापसी—(प्रवचन—पहला) अध्‍याय—15  सूत्र— श्रीमद्भगवद्गीता अथ पन्‍चदशोऽध्याय: श्रीभगवानुवाच: ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्‍थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णीनि यस्तं वेद स वेदवित्।। 1।। अधश्चोर्थ्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गण्णप्रवृद्धा विषयप्रवाला:। अधश्च मूलान्यनुसंततनि कर्मानुबन्धीनि मनष्यलोके।। 2।।   गणन्‍तय—...

गीता दर्शन–(प्रवचन–161)

अव्‍यभिचारी भक्‍ति—(प्रवचन—दसवां) अध्‍याय—14 सूत्र— मां च योऽव्‍यभिचारैण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतींत्‍यैतान्‍ब्रह्मभयाय कल्पते।। 26।। ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।। 27।।   और जो पुरुष अव्यभिचरीं भक्तिरूप...

गीता दर्शन–(प्रवचन–160)

आत्‍म—भाव और समत्‍व—(प्रवचन—नौवां) अध्‍याय—14     सूत्र— समदुःखसुखः स्वस्थ: समलोष्टाश्स्फाञ्जन: तुल्‍याप्रियाप्रियो धीरस्‍तुल्‍यनिन्‍दात्‍मसंस्‍तुति:।। 24।। मानापमानयोस्‍तुल्‍यस्‍तुल्‍यो मिप्रारियक्षयो:। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते।। 25।।   और जो निरंतर आत्म— भाव में स्थित हुआ, दुख— सुख को...

गीता दर्शन–(प्रवचन–159)

संन्‍यास गुणातीत है—(प्रवचन—आठवां) अध्‍याय—14     सूत्र—  अर्जन उवाच: कैर्लिङ्गैस्त्रीनुाणानेतानतझीए भवति प्रभो। किमाचार: कथं चैतांस्प्रीनुाणानतिवर्तते।। 21।। श्रभिगवानवाच: प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।। 22।। उदासीनवदासीनो गुणैयों...

गीता दर्शन–(प्रवचन–158)

असंग साक्षी—(प्रवचन—सातवां) अध्‍याय—14 सूत्र— नान्यं गुणेभ्‍य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यीत। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्‍छति।। 19।। गुणानेतानतीत्‍य त्रीन्‍देही देहसमुद्भवान्। जन्मस्त्युऋजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।। 20।।   और हे अर्जुन, जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के...

गीता दर्शन–(प्रवचन–157)

रूपांतरण का सूत्र: साक्षी—भाव—(प्रवचन—छठवां) अध्‍याय—14 सूत्र: कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्‍विक निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमस: फलम्।। 16।। सत्‍वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ श्व च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ।। 17।। ऊर्ध्व गच्छन्ति...

गीता दर्शन–(प्रवचन–156)

संबोधि और त्रिगुणात्‍मक अभिव्‍यक्‍ति—(प्रवचन—पाँचवाँ) अध्‍याय—14 सूत्र: अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।। 13।। यदा सत्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमीवदां लोकानमलान्मीतयद्यते ।। 14।। रजसि प्रलयं गत्वा कर्ममङ्गिषु...

गीता दर्शन–(प्रवचन–155)

होश: सत्‍व का द्वार—(प्रवचन—चौथा) अध्‍याय—14   सूत्र: रजस्तमश्चाभिभूय सत्वं भवति भारत। रज: सत्वं तमश्चैव तम: सत्व रजस्तथा ।। 10।। सर्वद्वरेषु देहेऽस्मिप्रकाश उयजाक्ते। ज्ञानं यदा तदा...

गीता दर्शन–(प्रवचन–154)

हे निष्‍पाप अर्जुन—(प्रवचन—तीसरा) अध्‍याय—14  सूत्र: रजो रागत्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। तन्‍न्‍िबघ्‍नति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।। 7।। तमस्थ्यानजं विद्धि मोहन सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्‍निबध्‍नाति भारत।। 8।। सत्यं सुखे संजयीत रज: कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्‍य तु तम: प्रमादे...

गीता दर्शन–(प्रवचन–153)

त्रिगुणात्‍मक जीवन के पार—(प्रवचन—दूसरा) अध्‍याय—14   सूत्र— सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:। तासो ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता।। 4।। सत्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसंभवा। निबध्‍नन्ति महाबाहो देहे देहिनमध्ययम्।। 5।। तत्र सत्वं निर्मलत्‍वात्प्रकाशकमनामयम्। सुखसङ्गेन...

गीता दर्शन–(प्रवचन–152)

चाह है संसार और अचाह हे परम सिद्धि—(प्रवचन—पहला) अध्‍याय—14   सूत्र: श्रीमद्भगवद्गली अथ चतर्दशोऽध्याय — श्रीभगवानवाच: परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता।। 1।। हदं ज्ञानमुपाश्‍चित्‍य...

गीता दर्शन–(भाग–7) ओशो

गीता—दर्शन—(भाग सात)   ओशो (ओशो द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय चौदह 'गुणत्रय—विभाग—योग', अध्याय पंद्रह 'पुरुषोत्तम—योग' एवं अध्याय सोलह 'दैव— असुर—संपद—विभाग—योग' पर दिए गए पच्चीस अमृत प्रवचनों...

गीता दर्शन–(प्रवचन–151)

अकस्‍मात विस्‍फोट की पूर्व—तैयारी—(प्रवचन—बारहवां) अध्‍याय—13 सूत्र— यथा प्रकाशयत्‍येक: कृत्‍स्‍नं लोकमिमं रवि:। क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्‍स्‍नं प्रकाशयति भारत।। 33।। स्थ्यैज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचमुवा। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्‍तरं च ये विदुर्यान्‍ति ते परम्।। 34।।   है अर्जुन, जिस प्रकार...

गीता दर्शन–(प्रवचन–150)

साधना और समझ—(प्रवचन—ग्‍यारहवां) अध्‍याय—13 सूत्र— अनादित्वान्‍निर्गुणत्वात्परमात्मायमब्यय:। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करौति न लिप्‍यते।। 31।। यथा सर्वगतं सौक्ष्‍म्यादास्काशं नोयलिप्‍यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्‍यते।। 32।।     है अर्जुन, अनादि होने से और...

गीता दर्शन–(प्रवचन–149)

कौन है आँख वाला—(प्रवचन—दसवां) अध्‍याय—13 सूत्र— समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्‍स्‍वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।। 27।। समं पश्यीन्ह सर्वत्र अमवीस्थतमीश्वरम्। न हिनस्मात्मनात्मानं ततो याति पंरा गतिम् ।। 28।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–148)

पुरूष में थिरता के चार मार्ग—(प्रवचन—नौवां) अध्‍याय—13 सूत्र— ध्यानेनात्‍मनि पश्‍यान्ति केचिदात्‍मानमात्‍मना। अन्ये सांख्‍येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।। 24।। अन्ये त्वेवमजानन्‍त: श्रुत्‍वान्‍येभ्‍य उपासते। तउपि चातितरन्‍त्येव मृत्‍यु श्रुतिपरायणा:।। 25।। यावत्‍संजायते किंचित्‍सत्‍वं स्‍थावरजड्गमम्। क्षेत्रक्षत्रज्ञसंयोत्‍तद्विद्धि...

गीता दर्शन–(प्रवचन–147)

गीता में समस्‍त मार्ग है—(प्रवचन—आठवां)      अध्‍याय—13 सूत्र— पुरूष प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुाणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्यसु।। 21।। उपदृष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता म्हेश्वर:। परमात्‍मेति चाप्‍युक्‍तो देहेउस्‍मिन्‍पुरूष: यर:।। 22।। य...

गीता दर्शन–(प्रवचन–146)

पुरूष—प्रकृति—लीला—(प्रवचन—सातवां) अध्‍याय—13 सूत्र— इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्‍तं समासत:। मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्यावायोपयद्यते।। 18।। प्रकृतिं पुरूषं चैव विद्यनादी उभावपि। क्किारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।। 19।। कार्यकरणकर्तृन्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते। पुरुष: सुखदुखानां...

गीता दर्शन–(प्रवचन–145)

स्‍वयं को बदलो—(प्रवचन—छठवां) गीता दर्शन—भाग—6 गीता--सूत्र बहिरन्तश्चइ भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थ चान्‍तिके च तत्।। 15।। अविभक्तं च भूतेषु विभक्तीमव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रीअष्णु प्रभविष्णु च।। 16।। ज्योतिषामयि...

गीता दर्शन–(प्रवचन–144)

समस्‍त विपरीतताओं का विलय—परमात्‍मा में—(प्रवचन—पांचवां) अध्‍याय—13 (गीता--सूत्र) ञेयं यत्‍तत्‍प्रवक्ष्यामि यजज्ञात्‍वामृतमश्‍नुते। अनादिमत्‍परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्‍यते।। 12।। सर्वत: पाणियादं तत्‍सर्वतोउक्षिशिरोमखम्। सर्वत: श्रुतिमल्‍लेके सर्वमावृत्य तिष्‍ठति।। 13।। सर्वोन्द्रयगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्‍तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभक्‍तृ च।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–143)

समत्‍व और एकीभाव—(प्रवचन—चौथा) अध्‍याय—13 (गीता--सूत्र) असक्‍तिरभिष्‍वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समीचत्‍तत्‍वमिष्टानिष्टोययीत्तषु।। 9।। मयि चानन्ययोगेन भाक्तईरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसोईख्वमरतिर्जनसंसदि।। 10।। अध्यात्‍मज्ञाननित्यन्वं तत्‍वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानीमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोउन्यथा।। 11।।   तथा पुत्र, स्त्री, घर और धनादि में...

गीता दर्शन–(प्रवचन–142)

रामकृष्‍ण की दिव्‍य बेहोशी—(प्रवचन—तीसरा) अध्‍याय—13 (गीता--सूत्र) अमानित्‍वमदम्भिन्वमीहंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योयासनं शौचं स्थैर्यमविनिग्रह:।। 7।। हन्द्रियाथेषु वैराग्यमनहंकार एव च। जन्ममृत्‍युजराव्‍याधिदु:खदौषानुदर्शनम्।। 8।। और हे अर्जुन, श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दंभाचरण का अभाव,...